Wednesday, 31 December 2014

मै कैसी हु?............................................

आज अपने दोस्त ने पूछा की मै कैसी हु
जवाब में तो था, “मै ठीक हु
मै वैसे ही हु जैसे थी
मै हर दिन बदलते रहती हु 
मै वो नही रह पाती
जिसे रहना है 
मै वैसे ही हु जो तुम मुझे देखती हो  
मेरे मन के भीतर तुम झांक नहीं सकती 
यह जानने के लिए की मै कैसी हु 
मै वैसे हु जो तुम मुझे अपने बाहरी जीवन में देखती हो  
मेरे ओठों की हसी, मेरी आँखों के चमक से 
मेरा जीवन को तुम पढ़ लेती हो   
मै अंदरूनी जीवन को तुम क्या जानो?
जिसे जानने के लिए तुम्हे मेरे मन के भीतर को झाकना होगा 
मुझसे प्यार भरी दोस्ती करनी पड़ेगी 
तब तुम्हारे सवाल का जवाब दिया जाएगा. 

जवाब में तो था, “मै ठीक हु 
जवाब देने के बाद मन में एक अचानक से शांती लगने लगी.
आगे और क्या जवाब दिया जाए अपने दोस्त को वो समझ नहीं आया?
लेकिन क्या मै वाकई में ठीक हु?
दिमाग में कई सारे विचार चलते रहते है दिनभर
उसके लिए अपने खुद के साथ झगड़ा शुरू हो जाता है
कभी अपने से खुश हु तो कभी रूठ लेती हु
लेकिन फिर एक बार मन मुझे मनाने चला आ जाता है
मुझे बाहों में भरकर फिर एक बार शुरू जीवन की रफ्तार को शुरू कर देने के लिए कहता है
अगर बीच में ही कुछ गड़बड़ हो तो मेरा मन कहता है कोई बात नहीं
फिर एक बार अपनी रोजमर्रा जीवन को जीने के लिए तैयार हो जाती हु
मेरे मन को मानते हुए. 

“आजका दिन यहोंवा ने बनाया है.....................”

आजपासून नविन वर्षाला सुरुवात होणार.

कितीतरी गोष्टी नव्याने होतील.

त्यात काही गोष्ट नविन वाटतच नाही

म्हणजेच रोजचे आयुष्य

नविन होईल तर माझी नविन नौकरी, नविन नाती-गोती, आणि बरेच काही.

बाकी पुढील वर्षात असतील ब्लॉक प्लेसमेंट्स, निरोप आपल्या कॉलेज ला त्यासंगे पास होण्याचे प्रमाणपत्र.

तसे पाहायला गेले तर प्रत्येक दिवस हां नविन असतो.

मग पुढचे वर्ष कश्यावरुन नविन?

हो २०१४ चे फक्त २०१५ होणार आहे, आता कळले हेच ते नविन.

दिवाकरजी म्हणायचे, “आजका दिन यहोंवा ने बनाया है.....................”

आणि त्यासंगे आनंद व्हायला ही सांगत होते 

मग तर प्रत्येक दिवस नविन आहे बर का वाचकहो!

मग का नाही प्रत्येक दिवस साजरा करुया.......................

Thursday, 11 December 2014

“तुम्ही बिल्डिंग मधे राहता”?.........................................


आजकल BMC स्कूल में जाने का मौक़ा मिल रहा है, एक फील्ड वर्क के स्वरुप में. कई सारे अनुभव मुझे करीब से जानने, महसूस करने मिल रहे है. बच्चे मुझे कई सारे सवाल करते है की मै कौन हु? क्या काम कर रही हु?

तो कल तीसरी कक्षा के क्लास में चली गयी थी, एक बच्ची ने मुझे यह सवाल किया की, “मै कहा रहती हु”? तो उसी सवाल से अपने पिछले स्कूल के अनुभव याद आने लगे और लगा की उसके बारे में इस सवाल के साथ लिखा जाए.

बच्चो के आसपास अगर कोई उनके उम्र से बड़ी व्यक्ती मिले तो उन्हें बहुत आश्चर्य होता है. लेकिन ऐसे वक्त में बच्चे मेरे बारे में सामन्य व्यक्ती की तरह देखे. वे मुझे अपने जैसा ही माने. मुझे कोई बड़ा न बनाये. तो इस सोच को कविता के जरिये बच्ची को बताना चाहती हु की वो मुझे अपने जैसा ही महसूस करे. 


“तुम्ही बिल्डिंग मधे राहता”?
इस सवाल का जवाब क्या दिया जाए?

मै भी तुम्हारी तरह सामन्य सी जिदंगी जी रही हु.
मै भी तुम्हारे तरह BMC स्कूल में पढ़ती थी.
जैसे तुम पढ़ती हो.
मैंने भी अपने टीचर की मार खाई है.
मैंने भी कक्षा में बैठकर हल्ला-गुल्ला किया है.
पढाई लिखाई में अलिप्त रहना यह मेरा काम लेकिन अन्य चीजो में रहना यह मेरी जरूरत.
एक थी चीज स्कूल में मजा-मस्ती
जो हमेशा अपनी लगती थी, और आज भी लगती है.
अपने आगे असेंबली के वक्त बैठी हुई लड़की के जूओ को उसके बालो में तैरते हुए गौरसे देखा है
और अपने ही बालों के जूओ को उसके हाथों से, अपने हतेली में रखते हुए देखा है
जब लडकियों के टॉयलेट का दरवाजा बंद देखती,
तो मन में संदेह आता की कुछ गड़बड़ है?
लडकों के टॉयलेट को ताकते हुए जाने की हमेशा उत्सुकता थी की कैसा है अंदर?
अपने स्कूल में अच्छी और बुरी टीचर के बारे में बात करते हुए अपने आप में देखा है.
अपनी वो टीचर जब भी पास से गुजरती तो उसके कपडों के खुशबु आज भी नाक में सूंघ रही हु
अपने उस सर की बड़ी आवाज आज भी कान में गूंजती है
उन दोस्तों के हसी-मजाक आज भी याद है
वो स्कूल में लड़के-लडकियों और लडकियों-लडकियों की जोडीया बनाकर चिढ़ाना बुरा लगता था 
लेकिन अभी-कभी आँखे, आँखों से टकरा जाए तो शर्म के मारे आँखे निचे हो जाती है
या फिर कभी हसी फूटती है.
लेकिन आज वो स्कूल नहीं रही जिस स्कूल में पढ़ती थी,
वो स्कूल underdevelopment में चली गई.
उसकी दीवारे, उसकी तस्वीरे मेरे मन के कोनों में दिखती है
वो स्कूल भले ही नहीं लेकिन मेरे आँखों के सामने हमेशा रहती है उन यादों के जरिये........................