Saturday, 4 January 2014

बात Sententia की.........................

Sententia  का फेस्टिवल काफी सुंदर था. उन दिनों में काफी कुछ सिखने-जानने मिला. sententia के पुरे टीम को मै शुक्रिया अदा करना चाहूंगी क्योंकि उन्होंने काफी कम और व्यस्त समय में इस कार्यक्रम का आयोजन किया.

उसमे हमारे कॉलेज के डिरेक्टर डॉक्टर परशुरामन आये थे जिन्होंने इस कार्यकृम का उद्घाटन किया. उन्होंने मानसिक स्वास्थ के बारे में अपने विचार व्यक्त किया और उसकी जररूत कितनी है. उसी के साथ उन्होंने अन्य भी कोर्स भी टीस के अलग संस्था में शुरू करने की सोच है.

उसके बाद वहापर टिस के एलुमनाई को भी बुलाया गया जिन्होंने अपने कार्य को लेते हुए बाते की की काउन्सलिंग की जरूरत कितनी है. तो उसमे icall के पारस, स्नेहा संस्था के सोशल वर्कर और अन्य लोग आए थे. सोशल वर्कर ने कहा था की, हमें काउन्सलिंग के साथ सोशल वर्क के बातो को भी लेके जाने की जरूरत है. जीस तरीके से व्यक्ति के भावनाओं को अहमियत होती है उसी के साथ हमें व्यक्ति के हक्क के बारे में भी सोचने की उतनी ही जरूरत है.

फेस्टिवल का विषय मानसिक आरोग्य था जो पैनल डिस्कशन में काफी ढंग से पूरा हुआ था. डॉ निलेश शहा ने मानसिक स्वास्थ के उपर काफी ढंग से जानकारी दी. उन्होंने आखिर में एक सुंदर सा संदेश दिया की, हमें जिदंगी में होनेवाली शारीरिक पीड़ा कभी-कभी दूर नहीं कर सकते इसलिए उसी के साथ रहना यही आखरी उपाय है याने “live with your pain”. उसके बाद दिलनाझ बोगा पत्रकार आई थी जो कश्मीर में काफी सालो से काम कर रही है. उसने वहापर पाया की मानसिक रोग के शिकार वहापर सबसे ज्यादा है. क्योंकि जो रोज के आतंकवादी हल्ले होते है तो पूरा इलाका दहशत से घिरा हुआ है तो लोग वहापर काफी भयभीत होकर जीते है. जैसे की कई लोगोंको रातको लगता है की, उनका दरवाजा कोई खट-खटा रहा है. इसलिए उन लोगो की रात सिर्फ बम्ब-ब्लास्ट, खून की नदिया, कई सारे मृत्य इस तरह की घटनाओं से गुजरती है.

कोशिश संस्था से तारिक कुरैशी आये थे. कोशिश संस्था और बेगर होम संलग्न काम कर रहे है. वे कह रहे थे की वहापर पचास प्रतिशत लोग मानसिक रोग के शिकार है. वहापर लोगो के साथ बातचीत करने के लिए कोई नहीं. लेकिन कोशिश इस संस्था की मदद और बेगर होम की सरकारी अफसरों की वजह से काम हो पा रहा है.

सर्वपल्ली राधाकृष्ण विद्यालय से मिस साक्षी राजशिर्के भी आई थी, जिन्होंने अपने स्कूल के अनुभव हमारे साथ साझा किये. हमारे एक स्टूडेंट्स के एक सवाल था की, जब हम बच्चो के साथ स्कूल में काम करते है तो उन्हें लैंगिक शिक्षण उसी के साथ बच्चो को उनके गुप्तांग के बारे में कैसे बताया जाए? तो उन्होंने काफी आसानी से जवाब दिया की, “बच्चो को इस तरह से कहना है की, जिस तरह से हम अपने हाथों का इस्तेमाल पानी पिने या अन्य काम करने के लिए करते है वैसे ही अपने कुल्हा (buttocks) का इस्तेमाल हम बैठने के लिए करते है”. इस तरह का जवाब काफी सुंदर शब्दों के साथ दिया जो बच्चो को समझने के लिए आसानी होगी.

उसके बाद स्वामीजी ब्राह्मविद आनंद जो सरकारी अफसर थे जिन्होंने काम छोड़ने के बाद अपना रूचि को अध्यात्मिकता की ओर बढ़ा दिया. उन्होंने लैंगिक शिक्षण की जरूरत, युवकों के साथ का काम के अनुभव को साझा किया.

तीसरे दिन में स्टूडेंट्स के लिए तीन तरीके के वर्कशॉप आयोजित किया था, जिसमे experiential थेरेपी, dance थेरेपी और एस्ट्रोलॉजी थेरेपी के तज्ञ व्यक्ती आये थे.