Thursday, 28 November 2013

लक्ष्मी


आज लक्ष्मी के घर जाने का संयोग हुआ| वैसे तो में उसके घर उसके भाई से मिलने गई थी | जो उसके बड़ी  माँ के लड़के का लड़का है तो रिश्ते में लक्ष्मी उसकी बुआ लागती है | काफी अजीब ही रिश्ता है | क्योंकि वे दोनों भी कक्षा ५ वी में पढ़ते है |
हरीश पिछले १ महीने  से स्कूल नहीं आ रहा है | उसके नानी से पता चला की वो स्कूल का टाइम होते है भाग जाता है | अभी तो वो आपसे मिलने आयेगा ही नहीं क्योंकि  उसे पता चल गया है | उसके माता – पिता अहमदाबाद काम करने जाते है | वो दोनों और उसका छोटा भाई वहा रहते है | हरीश को उसके दादी के पास छोड़ा है | हरीश के काकाजी से भी बात हुई तो उन्होंने कहा की, माता-पिता खुद कुछ बोलते नहीं तो लड़का बिघड ही जाएगा | तो हरीश तो मिलने आया ही नहीं तो में लक्ष्मी के घर उसके माँ को मिलने चली गई |
लक्ष्मी को ५ भाई  और १ बहन है | उसमे से ३  भाई और बहन की शादी हो चुकी | उसके बड़े भाई की बीवी का बच्चे की डिलीवरी होते समय ही देहांत हो गया| उसके दो भाई अहमदाबाद में काम  करते है, एक भाई ट्रक चलाता  है | दूसरा भाई मामा के घर रहता है | और सबसे छोटा भाई  ३ री कक्षा में पढता है | और खुद लक्ष्मी ५ वि कक्षा  में पढ़ती है |
जब उसके माँ को देखा तो वो काफी यंग लगी| पर वो खुद  एक सास, दादी है | उसके माँ  बता रही थी की, उसके कमर  के पीछे एक सुजन सी आई है | जो उन्हें उनके दो बच्चोंके के जन्म के बाद हुआ| और वह तकलीफ  अबतक है | वे कह रही थी की, लक्ष्मी  को आगे तक पढ़ाएंगे और उसके ५ वी कक्षा पास होने के बाद उसे होस्टल में डाल  देंगे | तो मैंने यह सुझाव  दिया की, वे खुद स्कूल में आकर हेडमास्टर जी से लक्ष्मी के होस्टल के बारे में बात करे | तो वो इस बात के बारे में सोचेगी |
लक्ष्मी स्कूल के बाद एक दूकान में झाड़ू – पोछा करने के लिए जाती है जिससे उसे दिन के २५ से ३० रूपये मिलते है | मुझे इस बात का डर है की, वे स्कूल पैसे के खातिर ना छोड़े | पर उसकी माँ मुझे विश्वास दिला रही थी की ऐसे नहीं होगा | खुद लक्ष्मी भी बड़े क्लास तक जाए समय काम नहीं करेंगी | तो यह सुनके अच्छा लगा की, लक्ष्मी को पढने की ललक है | लक्ष्मी को पढने लिए दिक्कत है | अब देखते है की, वो जल्द से जल्द पढना सीखे ताकि उसे आगे की पढाई के लिए दिक्कत नहीं आएगी |
लक्ष्मी की माँ कह रही थी की उनके बड़े बेटे अगुन्ठा छाप है, क्योंकि  उसके पीठ के पीछे होनेवाले दर्द का इलाज करने के लिए  वे सिख नहीं पाए | उसका उसे  दुःख है | यह स्थिती काफी गंभीर  लगी | की पूरा परिवार उन सारी चीजो से परे है जो उन्हें मिलने चाहिए | पूरा परिवार एक दुसरे को संभाल रहा  है | लक्ष्मी को दादी माँ  भी है वह भी अपना दुखड़ा सूना रही थी की उसके पीठ के पीछे काफी दर्द हो रहा है जिससे  वो दिन रात सो नहीं पाती | लक्ष्मी के माँ के पोति जो २ साल की उम्र की होगी जिसे पैरो पर बड़े-बड़े फोड़ीया आई जिसमे वो बच्ची काफी परेशान हो रही थी | वो रो रही थी| उन फोडीयो से खून भी निकल रहा था | उन्होंने इलाज करवाया पर उससे कुछ फर्क नहीं पड़ा |
यह आदिवासी लोग  कितने साल पीछे है की दुनिया कहा से कहा जा रही है? पर वे अभी भी उस बेबस अवस्था में जी रहे है | आज के दिन में उनके पास वह सारी सुविधाए होनी चाहिए पर अब कुछ नहीं है | मुझे इन बच्चों के जिंदगी के बारे में सोचती हु तो काफी दर्द होता है | की इनका भविष्य क्या होगा |

जन्म एक माँ का......................


आज का दिन  अच्छा है क्योंकि और एक माँ का जन्म हुआ है| पता  नही ऐसे कितने लड़कीया माँ के रूप में हर दिन  जन्म लेती है| कितना बड़ा  तोफा है इस प्रकृति का, जिसने  इतना बड़ा आविष्कार इस दुनिया में किया है| क्योंकि अगर  वो माँ का रूप धारण नहीं करती तो यह समाज चल ही नहीं सकता| लोग जिन्दा रह ही नहीं सकते, इस दुनिया को चलने के लिए  हर मानव जाती का का जन्म लेना बहुत जरुरी है, क्योंकि  हर कोई एक दुसरे का सहारा है और एक दुसरे की जरुरत है|
तो आज के दिन मेरे बेटी को माँ बनने का तोहफा मिला है, और वो आगे इस समाज को चलाने और उसमे खुशिया आने के लिए उसका हाथ बहुत बड़ा होगा| अभी तो वो यह नहीं जानती की आज जो उसे गिफ्ट मिला है वो कितना महत्वपूर्ण है, बस शायद वो उसे समझ रही होगी या महसूस कर रही है|
अभी मुझे थोडा अजीब सा लग रहा है की, जब लोगोंको ज्यादा करके पास  में रहने वाली औरतो को पता  चले की उसे महावारी शुरू हुई है तो वो उसे एकदम अलग  तरीके के से देखेंगे, बस में  यही चाहती हु की, लोग लडकीको आनेवाली महावारी को सामन्य लेकर उसे उसी तरह से देखे को वो अभी बच्ची है ना की वो बड़ी है, वो बड़ी तो तब होगी जब वो उस दुनिया को समझेगी| क्योंकि जब लडकियोंको महावारी आती है तब उसे कहा जाता है की वो बड़ी हो गई है, ना की यह देखा जाता है की बस एक छोटासा शरीर के भीतरी अंग में नयी बात का जन्म हुआ है| और फिर उसका हौआ बना देते है| शायद उन औरतों के साथ भी उनके बचपन में यही हुआ है|
पर जाने दो मुझे तो बस अपने बेटी को सपोर्ट करना है हर बार अगर वो इस बात से लेकर किसी और से परेशान होती है| पर अगर उसके भीतर यह समस्या भी आये तो उसे  झेलने की उसमें क्षमता आएगी| तो होने दो जो उसके साथ  होगा चूँकि वो दुनिया को समझने  का उसे मौका मिलेगा|  

Thursday, 14 November 2013



ये दिमाग/मन बड़ा बेशरम है,

कुछ भी सोचता है.

ण जाने कब क्या सोचेगा.......

उसको खुदको ही पता नही.........

क्योंकी यह मन चंचल है..बच्चे की तरह या फिर बनाया ही वैसे  ........



क्याकैसे लिखू पता नही,

लिखना चाहती हु बहुत कुछ.......

ये लिखना कितनी मस्त चीज होती है............

जहा पर रख सकते है अपनी बाते......विचार........

कोइ ना बोलनेवाला...ना सुननेवाला.........

क्योंकी कलम या किताब के पन्ने बोलते नाही....

और वो बोलेंगे भी क्यों............





हे परमेश्वर तु अजीब है, जो इतना
अजीब संसार बनाया है,

पर है बड़ा खुबसूरत,

इस जिंदगी को अपने हात मैं थामकर रखना चाहती हु,

उसे कोई ले ना जाये,

क्योंकी इस दुनियाके लोग उसे रखेंगे नही,

ऐसे लगता है यह जिंदगी कही ना जाये

वो हमेशा मेरे पास रहे............




आज फिर एक बार जिंदगी हसीन है.................



आज फिर एक बार जिंदगी हसीन है.................


क्यों पता है?

क्योंकी इतनी सुंदर बारिश हो रही है

और इस मोसम मैं अपने आप से प्यार आया है,

मन तो बस पता नही कहा है,

वो सिर्फ अपने आप में है,



इस सृष्टि के रखवालेने क्या बनाइ है यह सृष्टि,


उसे भी देखके खुदपर विश्वास नही होता होगा की उसीने ही बनाया है,


हम भी तो इस सृष्टि के भाग है,


जिसे उसने इतना दिमाग दिया है


इतना सोचने, चिजोंको महसूस करने का 

IMPORTANCE OF COVERSATION WITH THE CHILD


Many times I found that, the children don’t get chance/permission to talk in front of adults.  Because the adults thinks that the children are those who are not in age to talk as well for the adults the children are the tension or boring person of life because when child speaks which is not the subject or matter of them.

When child talk in the school, that time the teachers are feel that why children are talk so much? They try to make them silent. If anybody talks so they get punishment against it. But in reality in the context of the government school the teachers has lots of work to do, so they irritate with the burden of work, they need silence but in the class the children talks one at a time and the teachers are not in the situation to listen  anybody at one time. One more factor is that the teachers may not understand the psychology of the child that the talking is the natural process of the child they don’t able to silent. Within few minute of the silent the children starts talking. The children likes to talk, they don’t feel bored to talk.

Actual in the school the child needs to give time to talk other than the periods of the subject. When there is time for the talk for the children in the school they feel good in the school and even they likes to come regularly in the school. If we keep they shut up, they irritate with it and feel to go to out of school before ringing the bell. In the schools of the serawara or barothi  or antarsoba or bhuvali when there is time  for ringing the bell the children is ready with their bag to go out of the class, as bell rings the children are running with forcefully which I felt that they are participate in the running race.

The children may feel that, thank God! We are out of the jail!

बातचीत करना यह एक ऐसा माध्यम है की जिससे, बच्चे अपने आप को मानसिक रूप से विकसित करते है| उसमे यह होता है की, बच्चे चीजोके के बारे में सोचना, उनके उपर निष्कर्ष देना, ताल मेल बिठाना, यादोंको दोहराना, दो चीजोंका आपसी सबन्ध बिठाना, विश्लेषण करना, जिस चीज पर अभी तक ध्यान नहीं दिया उस पर ध्यान देना, विचारोंका आदान  प्रदान करना, भविष्यवाणी करना, दूसरोंकी भावना या उनके अनुभवोंकी कल्पना करना, स्वय की भावनाओं या उसके अनुभवोंकी कल्पना करना और उससे भी एक ओर बात होती है की अपने भाषा को विकसित करते है जो उनके बोली भाषा से मानक भाषा तक पोहचती है| (बच्चे की भाषा और अध्यापक  कृष्ण कुमार)

The teachers as well as parents needs to understand the importance of the child conversations and its advantage of development of the child. So they need to listen kids when he/she talks instead of stopping or restrict them to talk. So when we stop the kids to talk we are not able to understand them that how they think, their likes/dislikes, behavior pattern etc. While listen to the kid there will be the healthy interaction will take place and also the relationship will develop too among adults.

There are strategy to involve the children the interaction process

1.      Talk about self

Talk about the family and past life which helps to relate their life with textbooks to help in the learning

2.      Talk about the school experience

3.      Discussion on the pictures

Pictures of the newspapers, calendars, notebook, textbooks, tickets, labels, clothes, vessels, posters, etc

मेरी माँ की प्यारेटिंग



मेरी माँ जिसने मेरे साथ जो दिन बिताये याने की मेरे जीवन के २२ साल बहुत महत्वपूर्ण थे| और आज मुझे उसके प्यार, मुझे देखनेका का नजरिया, मेरे साथ व्यवहार यह सारी बातोंका अहसास मुझे अब उम्र के २५ साल मैं हो रहा है| खैर माँ को समझने में मैंने काफी दिन लगाये| पर उस बात का मुझे अफसोस नहीं है, क्योंकि मैंने अपने माँ को समझ तो लिया है!

मेरी माँ का मेरे साथ रहने का तरीका काफी बेहतरीन था| उसने पहली बात तो मुझे किसी भी बात मे नानहीं कहा| अब तो मैं इतनी बड़ी हो रही थी, तो उसने मुझे किसी भी बात पर ऊपर टोका या रोका नहीं| उसने मुझे बहुत सहजता से लिया| इस रिश्ते का उसने मुद्दा नहीं बनाया| यह रिश्ता हमारे बीच एक इन्सान को देखने या समझने का था|

दूसरी बात उसने मुझ पर किसी भी तरह का दबाव नहीं रखा जैसे, “अभी तु बड़ी हो गई है, तो तुझे अब सलवार सूट पहनना है, उस पर दुपट्टा लेने की जरुरत है, “ तुझे अभी गहने पहनने चाहिए, या तुझे फेशियल/ब्लीच करना चाहिएइत्यादी| उसने मुझे हमेशा जो कपडे चाहिए वे कपडे पहनने की इजाजत दी| वैसे देखा जाए तो माँ को इस मामले में कुछ पड़ी नहीं थी और तो और वह बाते उसके स्वभाव में नहीं थी मेरे बेटी ऐसा या वैसा करना चाहिए|

तीसरी बात माँ ने ३ या ४ बार के अलावा मेरे ऊपर कभी हाथ नहीं उठाया| वैसे तो माँ को पिटाई करना अच्छा नहीं लगता| उसने जब भी मेरे ऊपर हाथ उठाया तो कुछ महत्वपूर्ण कारण के वजह से उठाया था| तो उस वजह से मेरे मा पर मुझे कभी डर नहीं रहा, और आज भी नहीं है

मेरे मामले मे मुझे ऐसे लगता है की वो मुझे जैसे मैं हु वैसा ही देखती थी| पर उसकी कुछ बाते मेरे ऊपर अपेक्षा के रूप में रखती थी| जैसे, वो कहती थी की, “हमेशा हसता चेहरा रखना चाहिए, किसी के पंगो में नहीं आना चाहिए, मेरे साथ बात करनी चाहिएइत्यादी| तो यह बाते मेरे ऊपर कोई दबाव पैदा नहीं करती क्योंकि यही सारी बाते मेरे पास ट्रांसफर हो गई है| हा! पर कभी तो गड़बड़ हो जाती थी, तो वो मेरे ऊपर गुस्सा हो उठती जैसे में पुरे दिन खाना नहीं खा रही हु या उससे बात नहीं कर रही हु तो उसे काफी गुस्सा आता है|  

माँ ने तो पूरा पेरेंटिंग का रोल अच्छी तरह से निभाया| वैसे तो हम तीन भाई बहन है| तो मेरे साथ एकदम बेस्ट माँ बनी है, भाईयोंका का नहीं पाता की वे माँ के बारे क्या सोच रहे है?

माँ की तो यह बात ना की मुझमे स्तिमित दिखी तो हमारे आसपास के के जो छोटे बच्चे है उनके साथ भी मैंने यह व्यवहार देखा और वो आज भी है| इसलिए हमारे यहा के बच्चे माँ के साथ काफी अच्छा महसूस करते है| माँ  को देखते है सारे बच्चे उसके तरफ खिचे आ जाते है|

खेलने और पढाई से सिखना........


बच्चोंको को हमेशा से खेलने से आनंद मिलता है, क्यों? क्योंकि बच्चे उन खेलो में हमेशा उन्हें जो चाहिए वह वे खेलते है, वे खुद निर्णय लेते है की किसे क्या करना है| तथा वे खेल को अपना मानकर खेलते है, वे उनकी पसंद वाली चीजोंका उपयोग करके खेलते है| अगर हम पढाई की बात करे तो बच्चोंको पढाई बहुत लेटर स्टेज में दि जाती है| तो बच्चोंकी आयु के ६ से ७ वर्ष जीन चीजोसे से लगाव है उस से दूर करके, इक ऐसी चीज के पास लेके जाते है जिन्हें वे जानते नहीं, और उनके माता – पिता, स्कूल की ओर लेके जाते है जो की उनके के लिए नई है| वे उससे दूर भागते है| क्योंकि बच्चे को स्कूल जाने से पहले बताया नहीं जाता या फिर पूछां नहीं जाता की तुम्हे स्कूल जाना है की नहीं, ओर तो ओर बच्चे को शुरुवात से ही “स्कूल” इस शब्द से डराया तथा धमकाया जाता है| तो बच्चोंके मन में स्कूल के प्रती घृणा तो पैदा हो ही जाती है| बचोंको को शुरुवात में अगर स्कूल में ४ से ५ घंटे बिठाया जाता है तो नए लोग, नई जगह के प्रति काफी अस्थिरता होती है| आजकल तो बच्चोंको, आयु ३ से ४ वर्ष में नर्सरी तथा केजी में भेजा जाता है, जो उनके घर से दूर होता है|

बचपन में बच्चे खेलना शुरू कर देते है, तभी उन्हें इतनी रोकटोक नही की जाती पर जब वे स्कूल प्रवेश करते है, तब अभिभावकोंका बच्चोसे यह गुंजाईश होती है की, “ अब कम खेलना चाहिए”, “कितने देर खेलोगे, पढाई कोन करेगा?” इस तरह के वाकय जब बच्चोंके भीतर आने लगते है तो बच्चे पढाई के प्रति नफरत की ओर देखते है| वे भी इन सोच में होते है की, माता-पिता खेल से दूर क्यों कर रहे है? उस ही दिन से पढाई और खेल में भेदभाव दिखाई देता है|

तो हम अब बात करे की, खेलने से बच्चे क्या सीखते है| तो बच्चे खेलने से गणित, और सबसे बड़ी बात भाषा सीखते है| जो उनको बढने के लए बहुत बड़ी बात है| जो बचोंको पढने, लिखने के लिए मदद करता है|

खेल यह अच्छी चीज होती है, जिससे बच्चोंका मानसिक, शारीरिक, विकास होता है| खेल यह पुरी बॉडी ओर ब्रेन का वर्कआउट करता है| पढाई करते वक़्त बच्चे सिर्फ एक जगह पर बैठते है, उनके मस्तिष्क का विकास होता है, पर खेल में बच्चे यहाँ से वहा, वहा से यहाँ होते रहते है| जब की बच्चे इक जगह पर घंटो भर बैठ नहीं सकते| उन्हें हमेशा कुछ ना कुछ नया चाहिए होता है, वे ज्यादा देर तक इक ही चीज लेके बैठ नहीं सकते|

खेलने से बच्चे चिजोंको को बटोरना, रंगोंकी भिन्नता, गिनना, चीजोंके आकार, चिजोंकी समानता – भिन्नता, चिजोंकी की तुलना करना, और तो और वे गुडिया-गुडिया के खेल, कई स्पोर्ट्स जैसे कब्बडी, क्रिकेट में तो व्यावहारिक ज्ञान भी सीख लेते है|  जैसे की, निर्णय लेना, छोटे-बडोंकी समझ, इक दूसरे के आदर करना, टीम में कम करना, घर के कामोंको बाटना| रिश्तोंको समझना, उसकी अहमीयत को जानना, हर रोल को जानना जैसे की, माँ, भैया, पापा, काका, इत्यादी| (किताब - सीखना - सिखाना)

क्या यही है जिन्दगी?



क्या यही है जिन्दगी?
जहा पर न बोलना, केवल सुनना, समझना, देखना, परिस्थिती को संभालना,

यही सब करना

यह सारी बाते करते करते,
कही ऐसा न हो जाए,
की हम इश्वर बन जाए या उसका दर्जा मिल जाए|

यह दर्जा तो बहुत तकलीफ  देनेवाला है,
जहा में उस परमात्मा को समझ सकती हु की वो भी कितने तकलीफ से गुजर रहा है|

शायद यही करते करते
हम उम्र, जिन्दगी, परिस्थितिया बीती जायेगी?

और आखिर में एक सवाल छोड़ जायेगी की,
क्या यही है जिन्दगी?

क्या यही जिंदगी है?.............................




ऐसा लग रहा है कि जिंदगी एक अनुभव है जिसे मैं जी रही रही हू|

इसे जीते वक्त पता नहीं चल रहा है कि, कि कया सही है? और क्या गलत है?

बस्स ! इसे जी रही हू|

क्योंकि जिंदगी को करीब से देखना का मौक़ा मिल रहा है और उसे समझने का |

जिंदगी क्या है यह पता है  और कही पर पता भी नहीं चल रहा है |

शायद यही जिंदगी है !


वैसे तो इस समाज मैं जिंदगी का तो इशु बनाया जाता है !

कि ऐसा करा वैसा करो |

पर क्यों करे ?

क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि, जिंदगी को बस्स अनुभव करो

और इस दौरान तुम्हारे साथ जो हो रहा है उसे देखो और समझो |

पर इसमें कोई भी शक्स रिस्पोंसिबल नहीं होगा क्योंकि इस जिंदगी को तुम जी रहे हो |

और उसे जितना सामन्य लोगे उतना ही आसान होगा

क्योंकि विपश्यना मैं कहा गया है कि, जो तुम्हारे साथ हो रहा है उसे अनित्य भाव से देखो |

यहाँ पे अपने या किसीके के उपर इल्जाम लगाने कि जरूरत नही |