Saturday, 31 August 2013

काउन्सलिंग की प्रक्रिया इतनी लम्बी क्यों होती है?

क्योंकि तुम व्यक्ति को इस काबिल बनाते हो की वो खुद की जिदंगी को बदलने के लिए खुद पहले पहल करे | क्योंकि किसी को भी एक ही भेट में हम कह नहीं सकते की आपको ऐसे या वैसे रहना है, आपको यह करना है या वो करना है| इस तरह की बाधा व्यक्ति के जीवन में नहीं डाल सकते| क्योंकि वो पहले से ही अपने लोगो के साथ इसी प्रश्नों से झुझते है |

काउन्सलिंग में आये हुए तो वही लोग होते है| जो सबसे ज्यादा स्ट्रेस, गंभीर रुग्ण होते है| और वो जिनके पास पैसो की कमी होती है| अगर क्लाइंट औरत हो तो उन्हें तो डेढ़ सारे घर के काम होते है| एक सेशन ४५ मिनटों का होता है| एक पेपर में मैंने पढ़ा था की CBT में १०-२० सेशन होने की जरुरत है| पर इन औरतो को वक्त नहीं होता की वे आ पाए|  फिर तो समस्या वही की वही रहती है| अपर्णा मैम से एक बात पता चली की, कुछ समस्याए तो पहले मुलाकात में ही सुलझ जाती है| यह सुनके थोडा मन को सुकून भी मिला की चलो ऐसा भी होता है|

एक सोच आती है की जो लोग बहुत सारे पूर्वकल्पनाओं में रहते है जिन्होंने अपने उम्र के ३०-४० साल तक उन धारणाओं को रखा जिससे निकलना कितना मुश्किल होता है| इसलिए काउन्सलिंग के द्वारा उन्हें उनकी कल्पनाओं से निकालकर जिदंगी को नए सिरे से शुरुवात की जाती है| लेकिन इस धारणाओं को निकालना आसन नहीं है लेकिन CBT जैसे तकनीक इनमे काम आती है|

जरुर! यह प्रक्रिया लम्बी है लेकिन उसका इम्पैक्ट बहुत बहुत बड़ा है| जैसे की मै स्कूल में काम करती थी| उस वक्त हमारी सोच तो यही थी की हेडमास्टर को स्कूल के विकास के लिए बदलना है तो हम उन पर कोई भी अथॉरिटी को दर्शानी नहीं होती थी| उनके समस्याओं समझना, सुनना होता था बिना किसी विचारो को रखते हुए, पर हम स्कूल, बच्चे, किताबो के विचारो बताते हुए काम करते थे| इसलीये धीरे-धीरे हेडमास्टर, अध्यापक बदलते जा रहे थे| उन स्कूल में बदलाव दिखाई देता था| इस ही तरीके से काम लोगो के साथ भी है, बस कुछ-कुछ चीजे बदली है|


एक बात तो लगती है की सवांद यह बहुत तकलीफ और बड़ी लम्बी प्रक्रिया है| इसमें अगर हमने बात काट ली तो समझो की सवांद वहा ही ख़त्म हुआ| इसलिए हमारे कोर्स में सवांद पर बहुत ध्यान दिया है, उससे जुडी हुई बहुत सारी बाते हमें सीखते है और प्रैक्टिस भी करते है| मै सोचती हु की दुनिया में सुनने के लिए कोई नहीं है, actual हर कोई सुनता है और बोलता भी है| लेकिन जिस तरीके से सुनने की जरूरत है वो नहीं है| क्योंकि हमे बोलने के लिए इतने उतावले होते है की सुनना बस की बात नहीं| इसलिए सुनना इस बात को समझने को कोर्स के रूप में रूपांतर किया, ताकि हम जैसे बच्चे इसमें पढ़कर इस ही क्षेत्र में काम करे और अपने पेट को भरने के लिए भी व्यवस्था हो| कितना अजीब लगता है की, किसी को सुनने के लिए पैसे लेने पड़ेगे, पर क्या करे इसके अलावा कुछ काम भी तो नहीं है| मुझे लगता है की अगर मै काउंसलर बनू तो मुफ्त में ही लोगो की सुनु, और अपना पेट भरने के लिए कुछ अलग सोर्स का इन्तेजाम करू क्योंकि लोग ही ऐसे मिलेगे की उनके पास पैसे नहीं फीस देने के लिए, बच्चो के फीस जैसे तैसे भरते है, तो बोलने के लिए थोडीही कोई पैसा देगा?


बाकी टेक्निक्स या स्किल की बात करू उसके लिए काउंसलर को तो कोई खर्चा भी नहीं की स्किल्स या टेक्निक्स खरीदके लाओ, क्योंकि टेक्निक्स में तो सिर्फ कुछ शब्द और शरीर के कुछ भागो का इस्तेमाल होगा, तो सबकुछ नेचरल है| सिर्फ बुद्धिजीवियों के बातो का इस्तेमाल होगा, क्योंकि उन्होंने खुद प्रयोग किये है जिसे दुनिया में माना गया है| बस यह कोर्स सिखने के लिए रुपयोंकी, वक़्त देने की जरूरत है| मुझे तो लगता है की काउन्सलिंग तो बहुत ही आसन और सस्ती है| बस ध्यान से पढ़ना और समझने की जरुरत है| 

                                                                               १ सितम्बर २०१३ 

मेरी जिंदगी शिक्षा की तरफ......




जिदंगी मै कितना कुछ है जिसे मै देख रही हु, समझ रही हु| लेकिन मन तो मेरा बहुत मचलता है की क्या करू? कभी बहुत रो लेती हु, तो कभी हस लेती हु| तो कभी चिल्ला लेती हु| लेकिन इस चीख में कितना कुछ छुपा होता है| गले के सारे कंठ एक ही चीख में खुल जाते है| सर थोडासा भारी लगने लगता है|

जीवन की सच्चाईयों का सामना करना कितना कठिन होने लगा है| सोमवार को मेरी भेट ऑब्जरवेशन होम में थी| वहापर जो बच्चे घरसे भागे हुए, भिक मंगाते हुए, किसी ने चोरी, खून किया हो| ऐसे बच्चो को वहापर रखा जाता है| वैसे तो लोगो के लिए ऑब्जरवेशन होम याने एक बच्चो का जेल है| लेकिन वहापर किसी भी तरीके की शिक्षा याने फॉर्मल शिक्षा नहीं दि जाती लेकिन उसके कौशल्य, सोच पर काम किया जाता है याने नॉन-फॉर्मल शिक्षा दि जाती है| बच्चो को ६ महीनो तक रखा जाता है| बच्चो के माता-पिता बुला लेनेपर उन्हें छोड़ा जाता है| या बच्चो को किसी संस्था के शेल्टर होम में रखा जाता है|

वहा के स्टाफ की और से जो मैंने बच्चो की एक-एक करके कहानिया सुनी उससे तो मन बहुत सुन्न हो गया| उस वक्त लगा की जिंदगी ऐसी भी हो सकती है| ऐसे लगता है की मेरी जिदंगी तो कितनी आसान है! तब पर भी हम कितने सारे परेशानी में डूबे रहते है| इन बच्चो को तो पता भी नहीं होता की इनके साथ क्या होता है|

अभी सोशल वर्क से काउन्सलिंग के शिक्षा में आने के बाद बहुत कुछ परिवर्तन आया है| जब इतनी सारी घटनाए देखती हु, सुनती हु तो लगता है की मैं क्या कर रही हु? मेरी इतनी शिक्षा होने के बावजूद भी मेरे हाथ बंधे हुए है| मै इन लोगो के लिए कुछ नहीं कर सकती| लेकिन एक तरफ जिस शिक्षा से मै अब गुजर रही हु, वो तो मुझे अंदर-ही-अंदर काफी परेशान कर देनेवाली है| मुझे लगता है की अभी ही समस्या का समाधान होना चाहिए| लेकिन काउन्सलिंग यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो समाधान उसी ही व्यक्ति की और से मांगती है ना की कोई ओर व्यक्ति उसमे सोचे और सुझाव दे| काउन्सलिंग बहुत वक्त लेने वाला है पर उसके साथ उसका जवाब भी सही देनेवला है|



Friday, 30 August 2013

जिंदगी के जीने के मायने.............


फेलोशिप में आके जिंदगी के बहुत सारे पहलूओंको देखने, समझने मिला| हां जानती हु की दुनिया देखना और समझना बाकी है| इसलिए अब जिंदगी के वैसे ही निर्णय ले रही हु जिसमे करने के लिए बहुत सारी बाते हो| और दिमाग को भी व्यस्त और काम करने के लायक बना पाऊ|
एक बात तो मैंने सोची थी की ग्रेजुएशन के बाद कुछ काम करुँगी, फिर आगे की पढाई जारी रखूंगी| इसलिए उन दिनों में फेलोशिप में आने का फैसला मैंने कर लिया, वो भी एकदम सही समय पर क्योंकि फेलोशिप खत्म हो जाने के बाद मैंने सोचा की ग्रेजुएट विद्यार्थीयो को फेलोशिप में आने की जरुरत है, क्योंकि बहुत सारी बाते हमें पता नहीं होती की ग्रेजुएशन के बाद क्या किया जाए| तो ग्रेजुएट विद्यार्थीयो के लिए यही सही समय है की इस तरह के फेलोशिप में आके अपने आप को पहचाने, जाने, सोचे अपने जिंदगी के बारे में की क्या करना है?
फेलोशिप में आने के बाद इतना कुछ अपने जिंदगी के बारे में नहीं सोचा लेकिन जैसे ही हमारा प्रायवेट ड्रीम का टॉपिक शुरू हुआ वहा से ही अपने जिंदगी को मैंने काफी गंभीरता से देखना शुरू कर दिया| इसलिए अपने पढ़ाई के बारे में मैंने सोचा की उसके पास अब जाने की जरुरत है| फिर उसके लिए इसी तरह से तैयारी भी शुरू कर दी| तैयारी ढंग की होने की वजह से मेरा टाटा इंस्टिट्यूट में आगे एम ए के पढाई के लिए मेरा नंबर लग गया|और आज मै अपने इस फैसले से काफी खुश हु|
फेलोशिप में एक सबसे बड़ा फायदा हुआ की मुझे अपने इलाके से बाहर जाने के मौक़ा मिला| इससे बहुत कुछ देख पाई और लोगोसे परिचित हो पाई|इसलिए जिंदगी जीने के मायने भी समझ आ रहे थे|  राजस्थान, चंद्रपुर, ओरिसा जैसी जगह को देख पाई जिनके के बारे में किताबो में नाम पढ़ा था लेकिन देखने के उत्सुकता भी उतनी ही थी, लेकिन कब देखने मिलेगा ऐसा कुछ सोचा नहीं लेकिन फेलोशिप ने यह मौक़ा दिया | जो कृष्कुमार कहते थे की  बच्चे को अपने आसपास के चीज को देखकर वो दुनिया को जानता है और समझता है इसलिए शिक्षा सिर्फ किताबोसे नहीं बल्कि देखने,समझने,छूने से होती है|
आज घर आ जाने के बाद तो मेरे कॉलेज के कुछ प्रोफेसर तो मेरे इस चुने हुए रास्ते से तो काफी खुश है, मैंने अपने कॉलेज के प्रिंसिपल से भी फेलोशिप के बारे में बात की, उन्हें प्लेसमेंट सेल के द्वारा ग्रेजुएट स्टूडेंट को प्रोत्साहित करना चाहिए की वे इस तरह के अनुभव ले| जिससे वे अपने काम तथा अच्छे लगने वाले खुबियोंको को पकड़ पाए| इसलिए में सोच रही थी की BSW स्टूडेंट्स फेलोशिप जैसे अनुभव ले ताकि वे अपने कैरियर को चुन पायेंगे|
एक बात फेलोशिप में आके पता चली की अपने आप को संकुचित रखने से बहतु सारी बाते पता नहीं चलतीउसके लिए अपने दायरे को बढाने की जरुरत हैघर पर ही रहकेअपने ही लोगो तक रिश्ता स्तिमित करके जिंदगी पता नहीं चलतीउसके लिए बाहर निकलनेलोगोंको को मिलने की जरुरत हैजिससे हमें बहुत सारी बाते जिंदगी के बारे में जानने मिलती हैफिर जिंदगी बहुत बड़ी लगने लगती हैउसमे पता चलता है कीकितना कुछ देखना. जाननासमझना बाकी हैअब जिंदगी वाकई में बड़ी लगती है क्योंकिमुझे अब बहुत कुछपढना. सीखना बाकी है|
फेलोशिप में आने से पहले मै काफी अपने में ही जीती थी स्कूलकॉलेज में तो बहुत सारे दोस्त तो थे ही, लेकिन किसी के साथ बातचीत नहीं होती थीऔर कभी किसी को कुछ बताने की जरुरत भी नहीं लगीलेकिन जैसे ही फेलोशिप आने के बाद बहुत सारे लोग दोस्तभाईबहनटीचर मिलेइन लोगो के साथ बहुत सारे विषयो पर चर्चा होती थी जैसे शिक्षा, बच्चे की मानसिकता, लोगो की जिंदगी, गाव इत्यादि विषयो पर बातचीत होती थी| उसके साथ-साथ किताबे भी काफी पढ़े इसलिए आज किताबो से लगाव है|
फेलोशिप में मुझे विपश्यना और पर्सनल रिफ्लेक्शनयह प्रक्रिया काफी महत्वपूर्ण लगीक्योंकि इस दोनों प्रक्रिया में मैंने अपने पिछले जिंदगी के बारे में काफी सोचाजाना जिससे मै अपने बहुत सारे पुर्वकल्प्नाओसे बाहर निकलीजिससे अपने व्यक्तिगत जिंदगी में बहुत सारे परेशानिया हो सकती थीअब तो जिंदगीरिश्तेव्यक्ति  को देखने का नजरिया बदला है|
मैंने फेलोशिप के दौरान जो विलेज इमर्शन की प्रक्रिया में भाग लिया था तो वो बहुत ही सुंदर था| क्योंकि उस वक़्त मुझे परिवार की जरुरत का अहसास हुआ| क्योंकि बच्चे का संपर्क पहले उसके माता-पिता, दादी-दादा, काकी-काका और उसके अलावा बहुत सारे रिश्तो से उसका जुड़ाव हो जाता है, उनसे तो वो काफी कुछ सिख लेता है, क्योंकि वे सारे अनुभवी जो होते है, और तो और उन सब के साथ उसका प्यार, लगाव, भावनिक रूप से जुडाव् होता है| इसलिए जो सिख उसे मिलती है वो काफी जरुरी होती है| इसलिए मुझे अहसास हो रहा था की मै अपने परिवार से दो साल के लिए बाहर हु, लेकिन आ जो मै हु उसमे इनका बहुत बड़ा हाथ है| तो परिवार हर किसी को होने की जरूरत है, लेकिन मैंने ऐसे भी लोग देखे है जो अपने परिवार में ना रहकर भी उन्होंने अपनी जिंदगी बहुत सुंदर बनाई है, इसलिए इन दोनों पहलुओ का में एकदम अटल नहीं हु की परिवार होना या ना होना जरुरी ही है|
एक बात और देखने मिली विपश्यना के दौराना की जो चीज जैसी है उसे वैसे ही देखना उसमे यह था की हमारे में होनेवाली ख़ुशी, गम उसे अगर हम जैसे की वैसा देखोगे तो हम अपने जिंदगी को बहुत ही आसन तरीके से जी पायेंगे क्योंकि किसी चीज, व्यक्ति, परिस्थिति को देखने के बाद हमारे अंदर पहले हमारी भावना पैदा होती है उसके बाद हम उसपर प्रत्येक्ष रूप से रिएक्शन दिखाते है जिसकी हमारे जिंदगी में जरुरी नहीं है, क्योंकि हमारे भावनाए,हमारे आस पास के चीजे बहुत काल तक टिकने वाले नहीं है, क्योंकि चीजो का नाश और उत्त्पति होना तय है तो क्यों हम उसके पीछे माथापच्ची करे?इसलिए उनका कहना था की सबकुछ अनित्य है, permanant कुछ भी नहीं है| इसलिए अपनी जिंदगी में ज्यादा बहुत सारे बातो के पीछे मै नहीं पड़ती पर यह बात इतनी आसन नहीं है, लेकिन जो करने जैसा है उसे में करने की कोशिश तो करती हु|
दूसरी सोच से में निकल पाई वह यह है की जो हमारे महाराष्ट्र में हमारे मराठी भाई-बहन जिन लोगो को परप्रांतीय मानते है बल्कि वे भी इस भारत देश के हिस्सेदार है, बस हम सारे लोग अलग-अलग जगह से परिचित है, तो क्यों उन लोगो को अलग माना गया है? वैसे तो हमारे संवेधानिक अधिकार में तो हम यहाँ से वहा जा सकते है तो क्यो इतनी बंदी रखी है ? वैसे तो बायबल में मैंने पढ़ा था की, पर्र्मेश्वर ने यह प्रकृति तो हर किसी के लिये बनाई है तो क्यों इतना भेदभाव है इंसानों में? ये धरती, बारिश तो कभी नहीं कहती की तू मुस्लिम या ख्रिस्ती या बौद्ध है तो मेरे जमी या मेरे बारिश का आनंद मत ले? तो क्यों इंसान दुसरे से इंसान को कहता है की हमारे धरती पर कदम क्यों रखता है? 
आज जो मै हु उसका पहला श्रेय अपने माता-पिता, यह खुदा जिसने इस धरती के लोगोंको को जन्म दिया, उसके बाद मेरे मिस पालट जिन्होंने जिंदगी को सकारात्मक नजरियेसे देखने के लिए और पढाई में मेरी रूचि बढ़ाने के लिए हमेशा आगे रहे, उसके बाद मेरा निर्मला-निकेतन महाविद्यालय जिनके वजह से मुझे गाँधी फेलोशिप  के बारें में पता चला, और यहाँ से ही मैंने अपनी शिक्षा की शुरुवात की थी, जहा पर अपने महाविद्यालय के प्रोफेसर मिस मेहता, जिनसे मेरी हमेशा मुलाकात होती थी, तो उन्होंने भी मुझे जिंदगी के बहुत सारे पहलुओ को दिखने की कोशिश की और सबसे पहले मै खुद की जिंदगी को चुन पाई जिस लिए आज जिस मुकाम पर खड़ी हु, वहा मेरे खुद के परिश्रम और लगन की वजह से मै आज अपने जिंदगी को सुंदर बनाने के कोशिश में हु


आखिर वह दिन आ गया.......................................


हम पिकनिक के बारे में सोच रहे थे की, पिकनिक कब लेके जाएंगे | फिर प्रार्थना सभा में अध्यापकोने  बताया की, रविवार को पिकनिक लेके जायेंगे | उसके साथ-साथ कहा गया की, रोटी और खेतली की सब्जी लेते हुए आना |

हम सुबह जल्दी उठे | सुबह उठकर गरम पानी से स्नान किया | फिर हमने खाना बनाया | घर से खाना खाते हुए, हम विद्यालय आ गए और उसके साथ-साथ टिफिन भी लेके आये | सभी ने दो-दो की लाइन बनाई | फिर हम बस में बैठे | बस काफी बड़ी थी | फिर बस पिकनिक के लिए रवाना हुई | बस जब शुरू हुई तो हमने प्रार्थना, समूह गान गाया | हमने बस में अन्ताक्षरी गाई, कुछ बच्चे नाच रहे थे |  फिर उदयपुर से लेके हल्दी घाटी लगभग दोपहर के १ बजे तक पहुचे|
हल्दी घाटी में मौसम ठंडा था | वहा पर ऊंट को सजाया था, लोग ऊंट पर बैठकर घूम रहे थे | फिर हम सब दरवाजे के पास पहुचे, दरवाजा काफी बड़ा था | वहा पर महाराणा प्रताप के बारे में काफी जानकारी अलग-अलग माध्यम से बताई गयी | वहा पर महाराणा प्रताप की तस्वीर देखी, उसके साथ साथ, महाराणा प्रताप और अख़बर के बीच हुई लड़ाई को वोडीओ के माध्यम से दिखाया | हमें महाराणा प्रताप के बारे में बताने के लिए गाइड भी था |

वहा जब महाराणा प्रताप की लड़ाई हुई, तो उनके साथ लड़ने वाली सेना बहुत बड़ी थी और महाराणा प्रताप की सेना कम थी | युद्ध करते वक़्त महाराणा प्रताप की सेना कम होती गई | महाराणा प्रताप घबराने लगे | महाराणा प्रताप का चेतक घोडा बहुत खतरनाक और समझदार था | लड़ाई करते वक़्त उसके पैर पर चोट लगी थी तब पर भी तीन पैरो पर पाच किलोमीटर नाला पार करके उसने उनकी जान बचाई और उसके के बाद उसकी मृत्यु हो गई | वही पर उसकी समाधि बनाई | उसके बाद महाराणा प्रताप जंगल में रहे, उन्होंने यह शपथ ली की, “जब तक चित्तोड़ आजाद नहीं होगा तब तक मेरा महल यह जंगल है, पत्तो में खाऊंगा, घास में सोऊंगाउन्होंने २२ वर्ष जंगल में बिताए | म्यूजियम में महाराणा प्रताप के तीर, तलवार, लोहे के कपडे थे | उन्हें जो भी प्रमाण-पत्र मिला सभी वहा पर लगे हुए थे | हल्दी-घाटी में रेत, मिटटी, मकान आदि पीले थे| वही पर हमने बहुत फोटो भी खीचे |

जिस जगह महाराणा प्रताप और अख़बर का युद्ध हुआ वहा पर हमने पार्क में खाना खाया | भोजन से पहले मेम ने अखबार दिया, क्योंकि हम पार्क को साफ़-सुथरा रख पाए | जो भी कचरा हुआ था उसे हमने कचरा पात्र में डाल दिया |
खाना खाकर फतेह सागर झील को देखने के लिए रवाना हुए | झील बहुत बड़ी थी, उसमे बड़ी-बड़ी मछलिया थी | झील के किनारे कुछ नाव खड़े थे, तो कुछ नाव झील के दूसरे पार जा रही थी | फतह सागर के अंदर महल बनाए हुए थे | वहा पर भी महाराणा प्रताप के बारे में जानकारी थी | चेतक घोड़े पर बैठे हुए महाराणा प्रताप का चित्र बना हुआ था | हकीम खाँ सूरी का भी चित्र बना हुआ था | वहा पर एक मटका था और उसी मटके में से पानी निकल रहा था | फिर कुछ बच्चोने ने आइसक्रीम तथा चोकोबार खाई|

उसके बाद हम गुलाब बाग़ में गए | वहा पर कई प्रकार के फूल थे उसके साथ बड़े-बड़े वृक्ष भी थे | वहा पर झुला झूलने वाला भी था | वहा पर चिड़िया घर देखना था, पर वो बंद हो चूका था | फिर हमें रेलगाड़ी में बिठाया गया | रेलगाड़ी में बैठने के लिए हमें दो समूह में बाटा गया | फिर हम बारी-बारी से बैठे | रेलगाड़ी में बैठकर हमने पुरे गुलाब बाग की सफर की | रेल में बैठे-बैठे हमने, भालू, हिरन और बतख देखे | हिरन कूद रहे थे, भालू आराम से बैठा हुआ था | कुछ बतख लम्बी-लम्बी और बड़ी-बड़ी चोच वाले थे और कुछ छोटी-छोटी चोच वाले थे | बंदर पिंजरे में से निकलने के लिए इधर-उधर घूम रहे थे | लाल, पीले रंगों के तोते थे, मछलिया वे काच में बंद थी | रंग-बिरंगे चिड़िया थी |

शाम को ७ बजे के करीब हम घर के लिए रवाना हुए | रातको घर लौटने के बाद रोटी भी नहीं खाई | फिर सोचते-सोचते नींद आ गई | हमें बहुत आनंद आया | हमें पिकनिक जाकर बहुत अच्छा लगा एवं वहा पर बहुत मजा किया | हमने बहुत मनोरंजन किया|

पहले अंडा आया की मुर्गी आई?

                        
आज कक्षा ७ वी में जाने का मौका मिला| मैंने बच्चोंको एक प्रश्न दिया की, पहले मुर्गी आई की अंडा आया? तो बच्चोने ने उनके अनुभव तथा जो वो जानते है वह उन सारी बातोको साझा किया है|

सरला लिखती है की, मेरे घर में मुर्गी है| पहले मुर्गी आई, उसके बाद अंडा आया, अंडे से बच्चा निकला और धीरे-  धीरे वह बड़ा हो गया| फिर वह लिखती है की, सबसे पहला अंडा आया| फिर मुर्गी से अंडा निकला था|
राहुल लिखता है की, पहले मुर्गी और मुर्गा दोनों आये| दोनों की दोस्ती हुई और वो दोनों आपस में मिल गए| दोनों पति-पत्नी हो गए| उनका भी परिवार हो गया| परिवार इस वजह से हुआ क्योंकि मुर्गा ने अंडे दिया और मुर्गी अंडे पर १५ दिन तक बैठे रही| उसके बाद बच्चे की अंडे से आवाज़ आई और मुर्गी के कान तक पहुची और बच्चे निकलते है और उनका भी परिवार होता है|

राहुल,विकास और किरण लिखता है की, पहले अंडा आया और अंडे में मुर्गी निकली और फिर वो बड़ी होकर अंडे निकालती है| अंडे से मुर्गी निकलती है| जब कोई महेमान आते है तो तब उसके बच्चो को मारकर मिट बनाते है|

महेंद्र लिखता है की, पहले अंडा आया| फिर अंडा फुट गया| उनमे से बच्चा निकला|

वंदना,उर्वशीबसंती, टीना और डिंपल लिखते है की, पहले मुर्गी होती है तभी अंडे देती है| हमारे घर में मुर्गी नहीं है| लेकिन दुसरे के घर पर है इसलिए पता है| मुर्गी को भगवान ने पैदा किया तभी तो मुर्गी आइ, मुर्गी नहीं होती तो अंडा कहा से आता?
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चेतन कहता है की, पहले अंडा आया फिर मुर्गी आइ| मुर्गी १२ अंडे देती है| मुर्गी १२ बच्चे निकालते है| मुर्गी कुकू-कुकू करती है| फिर बच्चे के पास आती है| फिर मुर्गी बच्चे को सुलाती है| बच्चे को भूख लगती है तो बच्चे किस-किस कर बोलते है| कभी-कभी बच्चे को बिल्ली खा जाती है|

संजय ने कहानी के माध्यम से कहा की, सबसे पहले अंडा आया| अंडे में से बच्चा निकला| फिर बच्चो के पास मुर्गी आई| फिर मुर्गी बच्चे को बोलती है की बच्चो भूख लगी है? बच्चे बोलते है की, “ हा! माँ हमें भूख लगी है”| माँ बच्चे को खाना देती है| उसके बाद बच्चे खेलने जाते है| सारे बच्चे रात को सो जाते है| सिर्फ एक बच्चा जागता है| वो माँ को बोलता है की, “माँ बाहर जल्दी आओ देखो यहा नेवला आया है” सुबह उठकर बच्चे और मुर्गी खाना बनाते है| मुर्गी के घर मेहमान आते है| मेहमानों को खाना खिलाते है| बाकी खाना बचता है तो मुर्गी के बच्चे खा जाते है| फिर बच्चे खेरवाडा जाकर शाक-भाजी लेने जाते है| बच्चे भैयाजी को पूछते है की, “पैसे कितने हुए?” भैया कहता है की, “५० रुपये”| फिर बच्चे मेहमानों को केले और अंगूर बाटते है| सब लोग खुश हो जाते है|

अरविंद एक कहानी सुनाता है| सबसे पहले अंडा आया| फिर मुर्गी उसे चोच से अंडे को फोडती है, बच्चा टीस-टीस करता है| मुर्गी पुछती है की, “क्यों बच्चे टीस-टीस करता है? बच्चे कौन आ रहा है?” बच्चे कहते है की, “रोज –रोज नेवला आता है, वो हमें खाने आता है”| बच्चे जंगल में रोज चुगने जाते है| एक दिन बिल्ली पेड़ के निचे छुपती है, उसी पेड़ के निचे बच्चे आ जाते है और बिल्ली उनपर झपटा लगाती है और मुर्गी के बच्चे मर जाते है|  मुर्गी बहुत दुःखी होती है|
































डूंगरपुर जिला..............

डूंगरपुर जिला
राजस्थान के डूंगरपुर, बांसवाड़ा और उदयपुर का मिला जुला क्षेत्र "वागड़" कहलाता है। वागड़ प्रदेश अपने उत्सव प्रेम के लिए जाना जाता है। यहां की मूल बोली "वागड़ी" है। जिस पर गुजराती भाषा का प्रभाव दिखाई देता है। वागड़ प्रदेश की बहुसंख्यक लोग भील आदिवासियों की है। वहा पर कलाल समाज के भी लोग रहते है| यह इलाका पहाड़ो से घिरा हुआ है| इन्ही के तो बिच इन आदिवासी का घेरा है|

इन लोगो के बारे में कहा जाए तो, वे दुनिया के बातो से अजनबी है| वे अपने ही लोगो में रहते है| जैसे कहा गया है की, वे दुनिया के वास्तविकता से कोई तालुक्कात नहीं करते लेकिन, गुजरात पास में है तो काम के सिलसिले में अहमदाबाद में पलायन होता है और नेशनल हाईवे की स्थित में ही इलाका होने के नाते लोग अब जानने लगे है|

इनमे देखा जाए तो वे एक दुसरे के लिए हमेशा मदद के लिए तैयार होते है| यही इनकी विशेषता है| जैसे शादी की बात की जाए तो लोगो के मदद की वजह से शादी की विधि पूरी की जाती है| शादी के हल्दी की रस्म में जो कोई हल्दी लगाने दूल्हा या दुल्हन को लगाने आते है, हर कोई अपने अपने हिसाब से पैसे देने की कोशिश करता है और उसीसे से शादी की आगे की रस्म पूरी की जाती है|

हमारी भारतीय संस्कृती पुरुषप्रधान मानी जाती है| लेकिन इन्ही लोगो में औरते और पुरुष एक जैसे ही माने जाते है| लड़के और लडकियों को अपने पसंदीदार व्यक्ति को चुनने की संमती होती है| जैसे अप्रैल महीने में “भगोरिया” नाम का त्यौहार होता है| इनमे लड़के लडकिया मेले में आते है आते है, इस मेले में वे अपने पसंदीदार व्यक्ति को चुनके शादी की जाती है|

यहाँ की भाषा अगर जानो तो वागडी में बोली में बोली जाती है| यह भाषा थोडीसी गुजराती तथा हिंदी भाषा से मिलती-जुलती है| वैसे तो पास में ही २५ किलोमीटर की दुरी पर गुजरात है| इस वजह से भाषा उनसे मिलती जुलती है|

यहाँ पर महुआ नाम की शराब बनाई जाती है| जब महुआ के पेड़ पर फूल आते है, तो बड़े से लेकर छोटे बच्चो तक महुआ के फूलो को बिनते है और उसके बाद उसपर महुआ जाती है|
शिक्षा अब इन्ही लोगोमे बढ़ रही है, स्कूल में लडकियों की संख्या ज्यादा से ज्यादा दिखेगी | ज्यादा करके बच्चे वहापर शिक्षक-शिक्षक की बनने की रूचि है है|

बिच्छिवारा के इलाके में नागफणी नाम का मंदिर है जो जैन धर्म लोगो के दैवत है| चुंडावाडा और कनबा नाम के गाव लोगो में जानामाना है क्योंकि वहा का हर घर पढ़ा-लिखा है| कनबा गाव में ज्यादा से ज्यादा शिक्षको के घर स्थित है| उसके अलावा वकील, डाक्टरी की हुई लोग भी वहापर रहते है| चुंडावाडा में चुंडावाडा नाम का महल जानामाना है|

इनके लिए होली यह सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है, होली के पंधरा दिन पहले ही ढोल बजाये जाते है| होली दे दिन में लड़के-लडकिया नृत्य करते है|